Monday, March 15, 2021

औली यात्रा वृत्तांत भाग-1


औली यात्रा वृत्तांत 

भाग-1


जनवरी-2021


'प्राइवेट जॉब में छुट्टी मिलना किसी मनोकामना पूरी होने से कम नही'

' बैंक कर्मचारी होने के नाते दुसरा ओर चौथे शनिवार की कृपा तो हम पर है ही, लेकिन इसके आलावा अगर कोई लीव लेने की बात भी कर ले, तो शब्दों के खजाने की चाबी गुम हो जाती है ओर वही गिने-चुने, रटे रटाये डाईलोक-बाजी की बारिश शुरू हो जाती है....


....ओर यदि ऐसे मे अगर छुट्टी अप्रूव हो जाये तो फिर बात ही क्या.....


काफी विश्लेशण ओर छुट्टी का लेखा जोखा करने के बाद 23 जनवरी से 31 जनवरी तक औली-उत्तराखंड जाने का प्लान कर साहसिक कदम उठाते हुए मेल कर दिया, 


तुरंत ही बॉस का फोन आता है-


 "क्लोसिंग मे छुट्टी नही मिल पायेगी" 


मैने कहाँ " पर सर मैने प्लान कर चुका हूँ ।"


बॉस " नो "

 

थोड़ी देर फोन चलता रहा ....

गुस्से मे बॉस के फोन कट करने के पहले ही मैनें फटाक से कट किया ओर हमेशा की तरह, अब फिर से नौकरी मे हज़ारों बुराइयाँ नजर आने लगी ओर दिमाग़ मानो जुन की गर्मी की 45 डिग्री सेंटीग्रेड हो चुका था। जेसे तेसे काम निपटाने के बाद घर आ गया ।


मन एकदम उदास हो चुका था......घर जाकर बालकनी मे बेठा "जगजीतसिंह जी" की गजल सुन रहा था, की आवाज आयी, 


"पापा आपका फोन बज रहा है "

मैने कहाँ "बजने दो.."


थोडी देर बाद फिर फोन बजता है , ओर मेरी बेटी फोन लेकर आ जाती है ।


बॉस का फोन था...

"जी सर !" ( उदासी भरी आवाज में)


बॉस - "अरे वो तुम्हारे टूर का क्या हुआ?,....


............"मेंरा कोई रिप्लाई नहीं था".......

 

बॉस "भाई टुर कुछ ऐसा प्लान करो की 30 तारिख तक जॉइन कर लो यार"


मेंने मन ही मन सोचा एक दिन मे कोन सा पहाड़ टूटने वाला है ओर  कह दिया......."ठीक है, थैंक यू आप मेल पर ओके कर दिजीये"


फिर से मन मे शहनाईया बजने लगी।


ओर अगले ही दिन होटल से लगाकार ट्रेन तक की बूकिंस हमारे वरिष्ठ सलाहकार डॉ.सुमित शर्मा जी द्वारा करवा ली गयी। 


ओर जुट गये पैकिंग में औली की ठंड के मिज़ाज का जरा भी अहसास नही था फिर भी गर्म कपडे,बॉडीवार्मर,कम्बल,जर्किंन आदी रख लिये थे पावर बैंक, बिस्कीट,सेव ओर ना जाने क्या क्या से बैग खचाखच भर गया था।


ओर फिर 22 की शाम ....'जब हम स्पत्नी निजामुद्दीन मे सवार होकर औली के लिये निकले'


रात भर ट्रेन चलती रही सुबह तकरीबन 5.00 बजे हम उठ गये थे क्योकी निजाम 6.10 पर हमे दिल्ली छोड़ने वाली थी ओर वहॉ से हरिद्वार के लिये हमे 6.45 पर शताब्दी पकड़ना थी, लेकीन दिल्ली के निकटवर्ती स्टेशन फरीदाबाद से निकलते ही सत्यानाशी ट्रेन को जेसे सांप सूंघ गया हो स्पीड 20 तो कभी 10 ओर आखिर पहुँचते-पहुचते 6.38 हो चुके थे। युध्दस्तर पर ट्रेन पकड़ने का प्रोगाम तय हो चुका था । 

उतरते ही दौड़ लगा दि ।


 पुलिस वाले पूछा ...


"भाईसाहब' ये शताब्दी जो हरिद्वार जाने वाली है कोन से प्लेटफार्म पर मिलेगी ?"


उन्होने कहा -"जल्दी प्लेटफार्म नंबर 16 पर पहुँचो, निकालने ही वाली है"



 दोंनो ने एक दुसरे की ओर देखा, मानो ट्रेन पकड़ना हम दोनो का आखरी मक़सद है ओर फिर से दौड़ लगा दि.....


'हम प्लेटफार्म नंबर 1 पर थे । ओर 16 नंबर प्लेटफार्म सबसे आखरी।'


दो बडे बेग मेने उठा रखे थे ओर सोनू ( वाइफ ) के पास भी एक बेग था।


प्लेटफार्म 2..3..5..8...9....11 ...13....16 नंबर प्लेटफॉर्म पहुँचते-पहुँचते सांसे भर आयी थी ओर अच्छा खासा मॉर्निंग वॉक हो चुका था।


प्लेटफार्म पहुचने पर प्लेटफार्म  स्क्रीन पर हमारी ट्रेन की ही डिटेल्स चल रही थी । हमे लगा शायद ये शताब्दी भी निजाम की तरह लेट है । थोड़ा सुकून मिला, लेकिन ये क्या 2 सैकेण्ड बाद ही स्क्रीन चेंज ....आसपास पुछने पर पता चला की ट्रेन ने हमारे पहुचने के 2-3 मिनिट पहले ही रवानगी ली है, थोड़ी देर के लीये दुख तो मनाया पर 'औली' जाने की खुशी के मुकाबले ये कुछ भी नही था। 


क्रमशः अगला भाग


Friday, September 25, 2020

झाड़ उखाड़ हनुमान यात्रा

 झाड़ उखाड़ हनुमान, इंदौर मध्यप्रदेश 


12- 09-2020 


पहले ही सोच रखा था की आने वाले शनिवार को छुट्टी पड़ रही है तो कही घूमने निकलना है तो हमेशा की तरह बिना प्लान के गाद्दी उठायी ओर वाइफ के साथ घर से चल दिये । 


रास्ते मे फोन पर जानकारिया जुटायी गयी ओर तय हूआ "झाड़ उखाड़ हनुमान" जो की इंदौर से पूर्व की तरफ है जहाँ रालामंडल होते हुए जाया जा सकता है ओर खंडवा रोड से तिन्छा के रास्ते भी जाया जा सकता है हम चुकी देवास से गये थे तो रालामंडल वाला रूट सही था ।


मेरे लिये भी ये एकदम नयी जगह थी क्योंकि जब भी कोई एक या दो दिन का प्लान होता है तो आसपास की सभी स्थानों का भ्रमण किया हुआ है या सुना हुआ रहता है । 


मन मे काफी उत्सुकता थी क्योंकि जिन 'महानुभाव' ने हमे यहाँ जाने का सुझाव दिया था उन्होंने पहले ही उस जगह की तारीफों के पुल बांध दिये थे । 


देवास से रालामडल जाते समय खतरनाक वाली उमस हो रही थी ओर ये गर्मी देखकर लग रहा था, शायद लगत समय का चुनाव हुवा है पलट जाना चाहिये ।


लेकिन आगे जाकर इंद्रदेव प्रसन्नं हो गये ओर यात्रा सार्थक हो गई,थोड़ा आगे जाकर.......खुबसूरत नजारों ने अपनी उपस्तिथि दर्ज करवायी वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर लग रहा था मानो हम कही बहुत दूर आ गये हो विश्वास करना कठिन हो रहा था की क्या हमारे इतने नजदीक भी इतनी खुबसूरत जगह है, मन ही मन मे जिस  महानुभाव ने यहां जाने की हिदायत दी थी धन्यवाद दे रहा था ।


घुमावदार रास्तो पर बाइक चलाने का अनुभव ओर साथ साथ लगातार चल रहें सागवान और पता कौन-कौन से पेड़ पौधें, समतल घास के मैदान, घाट ओर हल्की बारिश वहाँ की खुबसूरती को ओर भी खुबसूरत बना रही थी.....।



रास्ते में घूमते-फिरते फोटो वोटो लेते हुये चलते रहे ....


अब रास्ता थोड़ा लम्बा मालुम हो रहा था तो गूगल बाबा पर लोकेशन चेक करने पाया की 8-10 की.मी आगे आ गये है।



समय का पता भी नही चला ओर समय हो चला था 3.30 के करीब , मतलब अब भोजन का समय हो गया था अब शान्त रहना थोडा मुश्किल हो गया था क्योकि मेंने रास्ते मे श्रीमती जी से आग्रह किया था की खाना पैक करवा लेते है लेकिन उनका फेसला था की खाना उधर से आकर ही खायेंगे....

भूख अब सहन नही हो रही थी उपर से हम रास्ता भटक चूके थे। आसपास  कोई दुकान या होटल भी नही था, खेर मेंने फिर से अपनी फटफटिया को स्टार्ट किया ओर ले लिया यू-टर्न .....सोचा दर्शन करके फटाफट निकलते है ।


थोडी देर बाद मंदिर पहुँच गये बजरंगबली मे हमारी श्रद्धा हमेशा से ही रही है अंदर जाकर देखा तो कुछ लोग माइक, स्पीकर इकठ्ठा कर रहे थे दर्शन करने के बाद जब थोड़ी दूर नजर पड़ीं तो मंदिर प्रांगण में बहुत से लोग खाना खा रहे थे ओर बढ़ीया वाली खुशबू आ रही थी ।

बस फिर क्या था मैं समझ चुका था की यहाँ जरूर सुंदरकांड का पाठ हूआ होगा ओर अब भोजन का प्रोग्राम है


 श्रीमती जी कुछ समझ पाते उसके पहले ही मेने कहा "चलो भोजन की व्यवस्था हो गयी है"

कहाँ'....."ऐसे किसी के प्रोगाम मे जाना ठीक नही है'

में बीन कुछ कहे आगे-आगे चल दिया वो भी पीछे-पीछे आ गये क्योकि भूख तो कडाके की लगी थी 

मेने जो लोग खडे थे उनसे "जय श्री राम' किया ओर बेठ गये मजे से भोजन करने...अह्हा बड़ी ही स्वादिष्ट दाल-बाटी बनी थी ..वहां कुछ लोग मजकिये तोर पर कह रहे थे भाई " जो भी लाना दो लाना" 


सब को दो दो बाटी रखी गयी, पहले दाल आयी फिर सुखी बाटी...ओर फिर लास्ट मे 'घी' मतलब "गड्डे वाली बाटी"

पेट भर खाना खाया हनुमानजी का धन्यवाद किया ओर आशीर्वाद लिया'

सब लोगों को "जय श्री राम" बोलकर फिर से वही नजारों का लुत्फ लेते हुये रात तक पहुँच गये गृहस्थाश्रम .....

Wednesday, July 18, 2018

बिना योजना यात्रा

15 को श्री मतीजी का जन्मदिन आ रहा था , इस बार पहले से ही सोच रखा था कि कही बार एक दो दिन के लिए घूमने निकल जायेंगे। क्योंकि मैं भी करीब एक साल से कही बाहर नही निकला था। सो कैलेंडर देखा और मन खुश हो गया क्योंकि 15 जुलाई को संडे था , झट से सैटरडे की छुट्टी की अर्जी लगा दी..

अब दो दिन थे मेरे पास पर कोई प्लान नही था कि किधर जाना है, दिमाग मे आइडिया आया कि हमारे भाई साब घुमक्कड़ सुमित जी से बात की जाए...तुरंत रिप्लाई आया और उदयपुर , माउंटआबू , सापुतारा जगह सुझाई गई लेकिन सारी जगह देवास से लगभग 15 से 20 घंटे की दूरी पर थी जो कि 2 दिन में कवर करना मुश्किल था । फिर से    रिप्लाई आया जिमसें ओम्कारेश्वर मांडव माहेश्वर आदि का नाम था।
फिर भी हम सुनिश्चित नही कर पा रहे थे कि जाना कहा है ...

बिना सोचे समझे बाइक उठाकर निकल पड़े सैटरडे मॉर्निंग..

रास्ते मे डिसाइड हुआ ओम्कारेश्वर ...

भाग-1