औली यात्रा वृत्तांत
भाग-1
जनवरी-2021
'प्राइवेट जॉब में छुट्टी मिलना किसी मनोकामना पूरी होने से कम नही'
' बैंक कर्मचारी होने के नाते दुसरा ओर चौथे शनिवार की कृपा तो हम पर है ही, लेकिन इसके आलावा अगर कोई लीव लेने की बात भी कर ले, तो शब्दों के खजाने की चाबी गुम हो जाती है ओर वही गिने-चुने, रटे रटाये डाईलोक-बाजी की बारिश शुरू हो जाती है....
....ओर यदि ऐसे मे अगर छुट्टी अप्रूव हो जाये तो फिर बात ही क्या.....
काफी विश्लेशण ओर छुट्टी का लेखा जोखा करने के बाद 23 जनवरी से 31 जनवरी तक औली-उत्तराखंड जाने का प्लान कर साहसिक कदम उठाते हुए मेल कर दिया,
तुरंत ही बॉस का फोन आता है-
"क्लोसिंग मे छुट्टी नही मिल पायेगी"
मैने कहाँ " पर सर मैने प्लान कर चुका हूँ ।"
बॉस " नो "
थोड़ी देर फोन चलता रहा ....
गुस्से मे बॉस के फोन कट करने के पहले ही मैनें फटाक से कट किया ओर हमेशा की तरह, अब फिर से नौकरी मे हज़ारों बुराइयाँ नजर आने लगी ओर दिमाग़ मानो जुन की गर्मी की 45 डिग्री सेंटीग्रेड हो चुका था। जेसे तेसे काम निपटाने के बाद घर आ गया ।
मन एकदम उदास हो चुका था......घर जाकर बालकनी मे बेठा "जगजीतसिंह जी" की गजल सुन रहा था, की आवाज आयी,
"पापा आपका फोन बज रहा है "
मैने कहाँ "बजने दो.."
थोडी देर बाद फिर फोन बजता है , ओर मेरी बेटी फोन लेकर आ जाती है ।
बॉस का फोन था...
"जी सर !" ( उदासी भरी आवाज में)
बॉस - "अरे वो तुम्हारे टूर का क्या हुआ?,....
............"मेंरा कोई रिप्लाई नहीं था".......
बॉस "भाई टुर कुछ ऐसा प्लान करो की 30 तारिख तक जॉइन कर लो यार"
मेंने मन ही मन सोचा एक दिन मे कोन सा पहाड़ टूटने वाला है ओर कह दिया......."ठीक है, थैंक यू आप मेल पर ओके कर दिजीये"
फिर से मन मे शहनाईया बजने लगी।
ओर अगले ही दिन होटल से लगाकार ट्रेन तक की बूकिंस हमारे वरिष्ठ सलाहकार डॉ.सुमित शर्मा जी द्वारा करवा ली गयी।
ओर जुट गये पैकिंग में औली की ठंड के मिज़ाज का जरा भी अहसास नही था फिर भी गर्म कपडे,बॉडीवार्मर,कम्बल,जर्किंन आदी रख लिये थे पावर बैंक, बिस्कीट,सेव ओर ना जाने क्या क्या से बैग खचाखच भर गया था।
ओर फिर 22 की शाम ....'जब हम स्पत्नी निजामुद्दीन मे सवार होकर औली के लिये निकले'
रात भर ट्रेन चलती रही सुबह तकरीबन 5.00 बजे हम उठ गये थे क्योकी निजाम 6.10 पर हमे दिल्ली छोड़ने वाली थी ओर वहॉ से हरिद्वार के लिये हमे 6.45 पर शताब्दी पकड़ना थी, लेकीन दिल्ली के निकटवर्ती स्टेशन फरीदाबाद से निकलते ही सत्यानाशी ट्रेन को जेसे सांप सूंघ गया हो स्पीड 20 तो कभी 10 ओर आखिर पहुँचते-पहुचते 6.38 हो चुके थे। युध्दस्तर पर ट्रेन पकड़ने का प्रोगाम तय हो चुका था ।
उतरते ही दौड़ लगा दि ।
पुलिस वाले पूछा ...
"भाईसाहब' ये शताब्दी जो हरिद्वार जाने वाली है कोन से प्लेटफार्म पर मिलेगी ?"
उन्होने कहा -"जल्दी प्लेटफार्म नंबर 16 पर पहुँचो, निकालने ही वाली है"
दोंनो ने एक दुसरे की ओर देखा, मानो ट्रेन पकड़ना हम दोनो का आखरी मक़सद है ओर फिर से दौड़ लगा दि.....
'हम प्लेटफार्म नंबर 1 पर थे । ओर 16 नंबर प्लेटफार्म सबसे आखरी।'
दो बडे बेग मेने उठा रखे थे ओर सोनू ( वाइफ ) के पास भी एक बेग था।
प्लेटफार्म 2..3..5..8...9....11 ...13....16 नंबर प्लेटफॉर्म पहुँचते-पहुँचते सांसे भर आयी थी ओर अच्छा खासा मॉर्निंग वॉक हो चुका था।
प्लेटफार्म पहुचने पर प्लेटफार्म स्क्रीन पर हमारी ट्रेन की ही डिटेल्स चल रही थी । हमे लगा शायद ये शताब्दी भी निजाम की तरह लेट है । थोड़ा सुकून मिला, लेकिन ये क्या 2 सैकेण्ड बाद ही स्क्रीन चेंज ....आसपास पुछने पर पता चला की ट्रेन ने हमारे पहुचने के 2-3 मिनिट पहले ही रवानगी ली है, थोड़ी देर के लीये दुख तो मनाया पर 'औली' जाने की खुशी के मुकाबले ये कुछ भी नही था।
क्रमशः अगला भाग
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